ऑफिस टाइम के बाद ‘नो कॉल–नो मेल’ का अधिकार! लोकसभा में पेश हुआ ‘राइट टू डिस्कनेक्ट बिल, 2025’

પ્રશાંત પ્રકાશ
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देश में जब 70 घंटे काम करने की बहस जोरों पर है, ऐसे समय में एक ऐसा बिल लोकसभा में पेश हुआ है जो कर्मचारियों को 'ऑफिस टाइम के बाद काम से पूरी तरह अलग होने का अधिकार' देता है। यह बिल कामकाजी लोगों के लिए एक बड़ी राहत की दिशा में कदम माना जा रहा है।


GenZ के तर्क और बढ़ती बहस

हाल के वर्षों में GenZ और मिलेनियल वर्कफोर्स ने 'वर्क लाइफ बैलेंस', 'मी टाइम' और 'मेंटल हेल्थ' जैसी चीज़ों को प्राथमिकता देने पर जोर दिया है। उनका मानना है कि लगातार बढ़ती कार्य संस्कृति और डिजिटलाइजेशन ने काम और निजी जीवन की सीमाएं मिटा दी हैं।
ऐसे माहौल में किसी भी समय बॉस का फोन आ जाना या देर रात ईमेल का जवाब देना अब सामान्य हो गया है—लेकिन मानसिक रूप से चुनौतीपूर्ण भी।

इसी पृष्ठभूमि में लोकसभा में पेश हुआ एक प्राइवेट मेंबर बिल चर्चा में है।


क्या है ‘राइट टू डिस्कनेक्ट बिल, 2025’?

एनसीपी की सांसद सुप्रिया सुले ने शुक्रवार को लोकसभा में यह प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया। बिल का उद्देश्य कर्मचारियों को ऑफिस समय के बाहर काम से जुड़े फोन कॉल, ईमेल या मैसेज का जवाब देने से छूट देना है।

बिल की मुख्य बातें -

1. ऑफिस टाइम के बाद काम से जुड़े कॉल लेने की मजबूरी नहीं

कर्मचारी को अधिकार होगा कि वह काम से जुड़े किसी भी कॉल, ईमेल या मैसेज का ऑफिस के निर्धारित समय के बाद जवाब ना दे।

2. छुट्टी के दिन भी पूरा 'डिस्कनेक्ट' रहने का अधिकार

वीकेंड, पब्लिक हॉलीडे या लम्बी छुट्टियों के दौरान भी कर्मचारी पर कोई दवाब नहीं रहेगा।

3. वेलफेयर अथॉरिटी का गठन

बिल में प्रस्ताव है कि एक ‘एम्प्लॉयी वेलफेयर अथॉरिटी’ बनाई जाए, जो कर्मचारियों की शिकायतें सुनेगी और कंपनियों पर नजर रखेगी।

4. कंपनियों पर जुर्माने का प्रावधान

अगर कोई संस्था इस नियम का पालन नहीं करती है, तो उस पर कुल पारिश्रमिक (टोटल रेम्यूनरेशन) का 1% तक जुर्माना लगाया जा सकता है।
यह पहली बार है जब भारत में कार्य-घंटों के बाहर संपर्क के लिए आर्थिक दंड का विचार सामने आया है।


यह बिल क्यों महत्वपूर्ण है?

📌 कर्मचारियों की मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षा

लगातार 24×7 उपलब्ध रहने की संस्कृति कर्मचारियों में तनाव, चिंता और बर्नआउट बढ़ाती है।

📌 निजी जीवन और रिश्तों पर असर

परिवार व निजी समय कम होने से जीवन असंतुलित हो जाता है।

📌 सुरक्षित और सम्मानजनक कार्य संस्कृति

यह बिल कार्यस्थल पर गरिमा और संतुलन को बढ़ावा देगा।


70 घंटे काम बनाम डिस्कनेक्ट का अधिकार – दो छोरों की बहस

एक तरफ भारत में 70 घंटे काम करने के मॉडल की वकालत होती है। इसके समर्थक कहते हैं कि इससे राष्ट्र की उत्पादकता बढ़ेगी।

वहीं दूसरी ओर GenZ और युवा कार्यबल का तर्क है—
"ज़िंदगी सिर्फ ऑफिस नहीं है, हम रोबोट नहीं हैं।"

'राइट टू डिस्कनेक्ट' बिल इसी मानसिकता का प्रतिनिधित्व करता है और यह दिखाता है कि आधुनिक कार्य संस्कृति के साथ-साथ कर्मचारियों की मानसिक और सामाजिक जरूरतों पर भी ध्यान देना जरूरी है।


क्या यह बिल पास होगा?

यह एक प्राइवेट मेंबर बिल है।
ऐसे बिल अक्सर बहस उत्पन्न करने और सरकार का ध्यान खींचने के लिए होते हैं।
अधिकतर प्राइवेट मेंबर बिल पास नहीं होते, लेकिन कई बार वे सरकार को किसी दिशा में कदम उठाने के लिए प्रेरित करते हैं।

फिलहाल यह बिल चर्चा में है, और कर्मचारियों ने इसे सोशल मीडिया पर खूब समर्थन दिया है।


‘राइट टू डिस्कनेक्ट बिल, 2025’ बढ़ती डिजिटल कार्यसंस्कृति के बीच कर्मचारियों के अधिकारों को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। यह आधुनिक भारत में कार्य और जीवन के संतुलन पर नई बहस को जन्म देता है।

देखना दिलचस्प होगा कि देश की संसद और सरकार इस पर क्या निर्णय लेती है।

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